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Tuesday, August 27, 2013

हे कृष्ण!

जय श्री कृष्ण!
जन्माष्टमी के उपलक्ष में एक प्रयास निवेदित है,कृपया समीक्षा करें-

त्याग,प्रेम अवतार श्याम
प्रेम रीति तो सिखाइये।
बृज-गोपियों सा त्याग रस
कलिकाल में भी डालिये।।

लोक-हित छोड़ा मंजु बृज
समोद मथुरा को धाए।
बही अश्कों की धार,जब
मेघ भावना के छाए।

तुमको भी जीता जिसने
हमें नीति वह सिखाइये।।

ज्ञान में ही मग्न ऊधौ
प्रेम भाव थे न मानते।
पर भक्त के विकार कृष्ण
चुन-चुन सब हैं निकालते।

उद्धव सम परोक्ष ज्ञान
अब हम सबको दिलाइये।।

है प्राप्ति में सुसुप्त प्रेम
विरह में जाग जाता है।
प्रेमी,इस वियोग में तो
ठौर-ठौर दिख जाता है।

डाँट मारी गोपियो ने
मत ये योग सिखलाइये।।

यदि कण-कण समाया श्याम,
उन्हें गिनके बताइए।
हम एक से ही मर मिटीं
वाणी-बाण न चलाइये।

जो ज्ञान को भी मात दे
वो ही प्रीति सिखलाइये।।
बृज-गोपियों सा त्याग-रस...
-विन्दु

10 comments:

  1. Replies
    1. जय श्री कृष्ण!
      धन्यवाद आदरणीय

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  2. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें,सादर!!

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  3. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें,सादर!!आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल गुरुवार (29-08-2013) को "ब्लॉग प्रसारण : शतकीय अंक" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.

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    1. आदरमीय राजेन्द्र जी आपका आभार!
      जन्माष्टमी की ढेरों शुभकामनाएं
      सादर

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  4. Replies
    1. शुक्रिया रंजन जी!

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  5. Replies
    1. धन्यवाद आदरणीय अमृता तन्मय जी!

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  6. बहुत ही सुन्दर रचना ।

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